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इसे जनसाधारण की बदनसीबी कहें या निराशावाद कि खबरों की आंधी में उड़ने वाले सूचनाओं के जो तिनके दूर से उन्हें रसगुल्ले जैसे प्रतीत होते हैं, वहीं नजदीक आने पर गुलगुले सा बेस्वाद हो जाते हैं।

अस्सी के दशक में होश संभालने वाली पीढ़ी के लिए उन्हें  स्वीकार करना सचमुच मुश्किल था। जिसका नाम था विनोद खन्ना।

भारतीय मुसलमानों के लिए देश में मदरसों द्वारा प्रदान की जा रही शिक्षा एक प्रकार से न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि आवश्यक भी है। भारतीय मुसलमानों

सड़कों पर रहने वाले लावारिस नन्‍हे बच्‍चों के लिए अब प्रसन्‍न होने का समय है। आमतौर पर ‘स्‍ट्रीट चिल्‍ड्रन (लावारिस बच्‍चे)’ कहे जाने वाले 20 लाख से अधिक भारतीय बच्‍चे सुरक्षित

आज कल जिसे देखो वही प्रेशर में आ कर गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड बनाने के जुगाड़ में लगा पड़ा हुआ है।

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